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Class 9 · HindiNCERT 2026 Revised Syllabus

Chapter 8: पद (0901CH08)

R1 and R2 book- Ganga

संत रैदास के दो भक्तिपूर्ण पद — प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति और समर्पण, जो उपमाओं, प्रतीकों और अलंकारों से सजे हैं।

Chapter code: 0901ch08 · Book: R1 and R2 book- Ganga · Class 9 Hindi

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रचना से संवाद — मेरे उत्तर मेरे तर्क(6 questions)

1

"अब कैसे छूटै राम रट लागी" पंक्ति का भाव है? (क) नाम उच्चारण की कठिनाई (ख) नाम रटकर याद करना (ग) आराध्य का नाम जपना (घ) मित्रों का नाम रटना

उत्तर:
(ग) आराध्य का नाम जपना।क्यों – आराध्य राम का नाम जपने में इतना आनंद है कि उसकी आदत छुड़ाए नहीं छूटती।
2

"प्रभु जी तुम चंदन हम पानी" पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है? (क) एकाकार और समरूप (ख) तरल और तीव्र सुगंध (ग) आश्रय और आश्रित (घ) द्रव और ठोस

उत्तर:
(क) एकाकार और समरूप।क्यों – यहाँ आराध्य और भक्त को एकाकार होता दिखाया गया है। पानी में चंदन की सुगंध व्याप्त हो गई है। दोनों मिलकर समरूप हो गए हैं।
3

"तुम दीपक, हम बाती" से रैदास का क्या भाव है? (क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है। (ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है। (ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है। (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।

उत्तर:
(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।क्यों – दीपक और बाती के मेल से ही प्रकाश फैलता है। एक के बिना दूसरा प्रकाश नहीं दे सकता।
4

"जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ" पंक्ति में रैदास का क्या आशय है? (क) परोपकारी भक्ति भाव (ख) आराध्य से अटूट संबंध (ग) सांसारिक मोह (घ) कर्मकांड पर बल

उत्तर:
(ख) आराध्य से अटूट संबंध।क्यों – इसमें भक्त रैदास पूरी तरह अपने प्रभु से अटूट संबंध रखना चाहते हैं। वे उनके बिना नहीं रह सकते।
5

"तीरथ बरत न करूँ अंदेसा" पंक्ति से आप क्या समझते हैं? (क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं। (ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं। (ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है। (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।

उत्तर:
(क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।क्यों – रैदास कहते हैं- भक्ति के लिए व्रत और तीर्थ करना जरूरी नहीं है। जरूरी है- अनन्य भक्ति।
6

सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है? (क) "जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा" (ख) "जाकी जोति बरै दिन राती" (ग) "तुम दीपक, हम बाती" (घ) "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा"

उत्तर:
(क) "जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा"।क्यों – सब जगह ईश्वर हैं, तभी तो हर जगह उनकी पूजा संभव है।

अर्थ और भाव(2 questions)

(क)

"प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।" — इस पंक्ति का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
इसमें संत रैदास अपने राम के प्रति अनन्य भक्ति दर्शाते हुए कहते हैं- हे प्रभु! तुम जल से भरे बादल के समान हो और मैं मोर हूँ। मुझे तुम्हारी ही प्यास है। तुम्हें घुमड़ते और बरसते देखकर मैं मोर के समान पंख खोलकर नाच उठता हूँ। मेरा रोम-रोम तुम्हें देखकर आनंदित होता है। जिस प्रकार चकोर पक्षी चाँद को देखने के लिए निरंतर आकाश की तरफ टकटकी लगाए रहता है, उसी प्रकार मैं भी सदा तुम्हें निहारता रहता हूँ। तुम्हीं मेरे सर्वस्व हो, आराध्य हो, ईश्वर हो।
(ख)

"तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।" — इस पंक्ति का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
इसमें संत रैदास भक्ति के बाहरी आडंबरों का विरोध और एकमात्र अपने ईश्वर की भक्ति करते हुए कहते हैं- हे मेरे राम! मेरे प्रभु! मुझे तीर्थ-व्रत आदि बाहरी आडंबरों की कोई परवाह नहीं है। मैं उनमें आस्था नहीं रखता। मुझे तो बस तुम्हारे ही कर-कमलों का भरोसा है। एक तुम्हीं मेरे प्राणनाथ हो। मैं तुम्हारी भक्ति में लीन हूँ।

मेरी समझ मेरे विचार(3 questions)

1

"जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ" पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।

उत्तर:
रैदास की अपने प्रभु राम में अगाध निष्ठा और आस्था है। वे उन्हें ही ईश्वर, कर्ता-धर्ता और सर्वस्व मानते हैं। वे मानते हैं कि उन्हीं से उनके जीवन का उद्धार होगा। अतः वे किसी भी सूरत में उनसे संबंध नहीं तोड़ना चाहते, उनसे दूर नहीं होना चाहते। सच तो यह है कि ईश्वर ही हमारा जन्मदाता, पालक और हितैषी है।उसे सदा याद रखना, उन पर भरोसा जतलाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। अतः रैदास की यह भावना बहुत मूल्यवान है। काश! मेरे जीवन में भी यह गहन आस्था आए।
2

रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?

उत्तर:
रैदास ने भाव-भक्ति को आधार माना है। उन्होंने प्रभु और स्वयं में, परमात्मा और आत्मा में अभिन्न संबंध माना है। वे मानते हैं कि प्राणी उसी परमात्मा से बिछड़ा हुआ अंश है। दोनों में अंश-अंशी, अंग-अंगी संबंध है। अतः भक्ति के लिए भावना की सच्चाई का और समर्पण का होना आवश्यक है। वे तीर्थ यात्रा, व्रत-उपवास को भक्ति के साधक नहीं मानते। इसलिए उन्हें इनकी जरूरत नहीं है।मेरे विचार से, भक्ति का एकमात्र आधार है- भावना की सच्चाई। बाहरी आडंबर सच्चे साधन नहीं हैं।
3

दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों / उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।

उत्तर:
पदों में आराध्य और भक्त के अनन्य संबंधों को निम्नलिखित उपमाओं और प्रतीकों से व्यक्त किया गया है-प्रभु – भक्त चंदन – पानी बादल और वन – मोर चंद्रमा – चकोर दीपक – बाती मोती – धागा सोना – सुहागा स्वामी – दास राम (ईश्वर) – भक्त (रैदास)

विधा से संवाद — कविता का सौंदर्य(1 questions)

1

आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।(संकेत – "प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।" में अनुप्रास अलंकार है। "प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।" में उपमा अलंकार है। "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।" में रूपक अलंकार है।)

उत्तर:
अनुप्रास अलंकार – जिस रचना में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।उदाहरण – "प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।" यहाँ घ, ब, म, ज, च वर्णों की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है।उपमा अलंकार – किसी प्रसिद्ध वस्तु की समानता के आधार पर जब किसी वस्तु या व्यक्ति के रूप, गुण, धर्म का वर्णन किया जाता है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है।उदाहरण – "प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।" यहाँ मोती और धागे की तुलना की गई है।रूपक अलंकार – जहाँ रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित किया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।उदाहरण – "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।" यहाँ प्रभु के चरणों को ही कमल मान लिया गया है।

विधा से संवाद — कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ(1 questions)

1

नीचे दी गई सूची में रैदास के दोनों पदों से कुछ विशेषताएँ चुनकर दी गई हैं। पदों में से चुनकर इन विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए।विशेषताएँ: (क) अनन्य भक्ति भाव (ख) सरल और लोकधर्मी भाषा (ग) उपमा और तुलना (घ) लयात्मकता और गेयता / ध्वन्यात्मकता (ङ) दृढ़ निष्ठा और आस्था

उत्तर:
अनन्य भक्ति भाव – "जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।"सरल और लोकधर्मी भाषा – "प्रभु जी! तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी।"उपमा और तुलना – "प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा।" यहाँ मोर और चकोर उपमान हैं। कवि की भक्ति उपमेय है। 'सा' वाचक शब्द और समान धर्म लुप्त है। अतः यहाँ उपमा अलंकार है। इसे चाहें तो भक्त और ईश्वर के बीच संबंधों की तुलना भी कहा जा सकता है।लयात्मकता और गेयता / ध्वन्यात्मकता – "प्रभु जी तुम मोती, हम धागा। जैसे सोने मिलत सुहागा।" कवि ने लय और गेयता बनाए रखने के लिए 'सोना' की जगह 'सोने' शब्द कर दिया है। शब्दों को लय और संगीत के अनुसार ढाल दिया है। 'सोने मिलत सुहागा' में सभी शब्द, उनकी ध्वनियाँ बहुत कोमल और मधुर हैं। माधुर्य गुण।अन्य उदाहरण- "जहँ-जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।" (लय और मधुरता बनाने के लिए 'नहीं' का 'नहिं' कर दिया है।)दृढ़ निष्ठा और आस्था – "जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ। तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।"

विषयों से संवाद(3 questions)

1

तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं?(संकेत – आप अपने सामाजिक विज्ञान के शिक्षक की सहायता भी ले सकते हैं।)

उत्तर:
रैदास के समय में भक्ति आंदोलन चल रहा था। पूरा भारत भक्ति के भाव में मग्न था। एक ओर इस्लाम ने मंदिरों को तोड़ा, मूर्तियों का विरोध किया। धर्म और भक्ति के क्षेत्र में व्रत-उपवास, तीर्थ-पूजा आदि के घोर आडंबर प्रचलित थे। ऐसे विरोधी वातावरण में संत साहित्य का उदय हुआ। संत कवियों ने हिंदुओं की भक्ति को मुसलमानों की तोड़-फोड़ से भी बचाया तथा निराकार भक्ति का नया रास्ता बनाया। यही कारण है कि रैदास के राम राम होते हुए भी राम नहीं हैं। वे निराकार ब्रह्म हैं। इससे मुस्लिम शासकों को भी आपत्ति नहीं थी और हिंदुओं की भक्ति भी सुरक्षित रही। एक प्रकार से यह कठिनाइयों के बीच से निकलता हुआ एक रास्ता है।
2

"सोने मिलत सुहागा" — 'सुहागा' एक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। 'सुहागा' का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।

उत्तर:
छात्र स्वयं करें। सुहागा (बोरेक्स) एक प्राकृतिक खनिज है, जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर होकर उसकी चमक बढ़ती है। इसका रासायनिक नाम सोडियम बोरेट (Na2B4O7·10H2O) है। विद्यार्थी अपने विज्ञान शिक्षक से चर्चा कर पूरी जानकारी लिखें।
3

अब अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और बताइए कि रैदास तथा नामदेव के पदों में क्या-क्या अंतर है और क्या-क्या समानताएँ हैं?

उत्तर:
समानताएँ – दोनों भक्तिकाल के संत कवि हैं; दोनों ने जाति-पाँति, तीर्थ-व्रत के बाह्य आडंबरों का विरोध किया और मन की सच्ची भक्ति को प्रधान माना; दोनों के पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं; दोनों की वाणी लोक-जीवन से जुड़ी सरल है।अंतर – रैदास काशी के संत हैं और निर्गुण राम के उपासक हैं (उनके पदों में ‘बेगमपुरा’ जैसा समाज-दर्शन मिलता है); नामदेव महाराष्ट्र के वारकरी संत हैं और विट्ठल के उपासक हैं। रैदास की भाषा में अवधी-ब्रज का पुट है, जबकि नामदेव के पदों में मराठी प्रभाव वाली हिंदी है। नामदेव ने पंजाब में जाकर प्रचार किया, जबकि रैदास का कार्यक्षेत्र मुख्यतः काशी और उत्तर भारत रहा।

भाषा से संवाद — व्याकरण की बात (शब्दों की बात)(2 questions)

1

पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।

उत्तर:
संज्ञा – राम, चंदन, घन, मोरा, चंद, चकोरा, दीपक, बातीसर्वनाम – तुम, हम, मैं, कवन, तुम्हरे, सबन
2

रैदास के इन दोनों पदों में बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों को देखिए। आप या आपके आस-पास के लोग इन शब्दों के लिए किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए।मोरा, बाती, सोने, बरत, चकोरा, राती, तीरथ

उत्तर:
मोरा – मोर बाती – बत्ती / वर्तिका सोने – सोना बरत – व्रत चकोरा – चकोर राती – रात तीरथ – तीर्थ

सृजन(3 questions)

1

कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को गाकर / पाठ करके प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर:
विद्यार्थी कक्षा में समूह बनाकर दोनों पदों को लय और भाव के साथ गाकर / पाठ करके प्रस्तुत करें।
2

कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।

उत्तर:
मोर – मेरे घनश्याम! घन – मैं तुम्हारे पास हूँ। मोर – आओ बरसो न मुझ पर! घन – देखो! मैं तुम्हारे लिए ही घिरा हूँ। उमड़ा हूँ। मोर – घनश्याम! अब रहा नहीं जाता। बरसो! मेरा अंग-अंग तुम्हारे प्रेम-जल के लिए प्यासा है। घन – धैर्य धरो! मयूर! दूरी का भी अपना आनंद है। मोर – अब यह वियोग सहा नहीं जाता। मेरे पंख फैलने के लिए व्याकुल हैं।(तभी बादल बरसते हैं। मोर पंख खोलकर नाचता है।)हे प्रभु! बस इसी सुख के लिए जी रहा हूँ। तुम सदा बरसते रहो। कहाँ चले जाते हो मुझे छोड़कर! घन – मैं तुम्हारे मन में सदा विहार करता हूँ। आँख बंद करके मुझे देख लिया करो। मोर – इसी-से तो मैं जीवित हूँ। वरना कभी का चल दिया होता! घन – कहाँ? मेरे पास ही तो आते।(मोर की आँखें बंद हो जाती हैं।)
3

"जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ" पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।

उत्तर:
बालक नरेंद्र अपने गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस से संबंध तोड़ आया है। नरेंद्र के हितैषी मित्रों ने बताया- अरे रामकृष्ण परमहंस ढोंगी है। वह माँ काली की पूजा करता है। माँ के सामने बैठकर बातें करता है। आँखों से आँसू बहाता है। कैसा लाचार गुरु है तेरा!नरेंद्र वकील का बेटा है। तर्क जानता है। उसे लगा – सच में रामकृष्ण पागल है। नरेंद्र ने दक्षिणेश्वर जाना छोड़ दिया। महीनों बीत गए। नरेंद्र दक्षिणेश्वर नहीं गया परमहंस से मिलने।परमहंस तड़पने लगे। उन्हें लगा – मेरा कन्हैया मुझसे रूठ गया। वे गुरु हैं तो क्या? एक दिन वे स्वयं चल पड़े उस प्रार्थना सभा में, जहाँ नरेंद्र आया करता था। सभा में भाषण चल रहा था। परमहंस ने ब्रह्म के बारे में सुना तो नाचने लगे। उनकी वहीं समाधि लग गई।सभा के आयोजकों ने सोचा- यह परमहंस उनकी सभा को बिगाड़ने आया है। उन्होंने बत्तियाँ बुझा दी। परमहंस का अपमान किया। यह देखकर नरेंद्र से रहा न गया। उनका प्रेम उमड़ पड़ा। वे परमहंस को लेकर बाहर चले आए।नरेंद्र बोले- गुरुजी! आप यहाँ क्यों आ गए?परमहंस बोले- नरेंद्र! तू मेरा ब्रह्म है। तू मेरा ईश्वर है। ईश्वर रूठ जाएगा तो क्या मैं भी रूठ जाऊँ! नहीं, मैं तुझे नहीं भूल सकता। तू तो मेरा प्राण है रे!बस फिर क्या था! नरेंद्र उस दिन से परमहंस का परम भक्त हो गया।

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