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Class 9 · HindiNCERT 2026 Revised Syllabus

Chapter 9: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद (0901CH09)

R1 and R2 book- Ganga

तुलसीदास के रामचरितमानस (बालकांड) से — शिव धनुष के खंडन पर क्रुद्ध परशुराम और राम-लक्ष्मण के विनम्र-व्यंग्यपूर्ण संवाद का प्रसंग।

Chapter code: 0901ch09 · Book: R1 and R2 book- Ganga · Class 9 Hindi

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रचना से संवाद — मेरे उत्तर मेरे तर्क(5 questions)

1

"पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥" यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है? (क) आदर और सम्मान (ख) भक्ति और श्रद्धा (ग) भय और शिष्टाचार (घ) प्रेम और सहिष्णुता

उत्तर:
(ग) भय और शिष्टाचार।क्यों – सभी लोग परशुराम से भयभीत थे। कोई भी उनके प्रति आदर, भक्ति या प्रेम नहीं रखता था। सभी ने भय और शिष्टाचार के नाते अपना-अपना परिचय दिया।
2

"जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा" पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है? (क) संवेदनशीलता (ख) शिष्टता (ग) सहनशीलता (घ) उदासीनता

उत्तर:
(ख) शिष्टता।क्यों – अपने घर आए अतिथि का सम्मान करना, उन्हें प्रणाम करना, अपने बच्चों से प्रणाम करवाना शिष्टता का पहला संस्कार है।
3

"अति रिस बोले बचन कठोरा।" जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था- (क) उचित आदर-सत्कार न मिलना (ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना (ग) शिव धनुष का खंडित होना (घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति

उत्तर:
(ग) शिव धनुष का खंडित होना।क्यों – यों तो (क) और (ख) दोनों भी ठीक कारण हैं; किंतु सबसे बड़ा कारण है अपने गुरु भगवान शिव के धनुष के प्रति मोह। वे जीते-जी यह नहीं देख सकते थे कि कोई उनके होते शिव धनुष को तोड़ दे। इसमें वे अपना अपमान मानते थे।
4

राम का कथन "होइहि केउ एक दास तुम्हारा" उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है? (क) कूटनीति और चतुराई (ख) विनम्रता और मर्यादा (ग) त्याग और समर्पण (घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास

उत्तर:
(ख) विनम्रता और मर्यादा।क्यों – श्रीराम स्वभाव से चतुर नहीं थे। वे ज्ञानियों के प्रति मन से बहुत विनम्र थे और मर्यादा उनके स्वभाव में थी।
5

"सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।" लक्ष्मण के मुस्कराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था? (क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे। (ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था। (ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे। (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

उत्तर:
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।क्यों – न उनमें प्रदर्शन की भावना थी, न अहंकार। वे परशुराम की शक्ति से डरने वाले भी नहीं थे। अतः यही उत्तर सही है कि वे किसी बड़बोले घमंडी का घमंड तोड़ना चाहते थे।

मेरी समझ मेरे विचार(4 questions)

1

"अरध निमेष कलप सम बीता" पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?

उत्तर:
राम के धनुष तोड़ने पर सीता बहुत प्रसन्न थीं, किंतु परशुराम ने धनुष तोड़ने वाले को मार डालने की प्रतिज्ञा की। वे परशुराम का महाक्रोधी और हठी स्वभाव जानती थीं। इसलिए वे बहुत अधीर और बेचैन हो उठीं। उनका एक-एक पल हजारों वर्षों के समान बीतने लगा।
2

"सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥" पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर:
महाक्रोधी परशुराम ने राजाओं से भरी सभा में यह कहा कि या तो धनुष तोड़ने वाले को मेरे हवाले कर दो, वरना मैं सभी राजाओं को मार डालूँगा। सभी राजा परशुराम के महाक्रोधी और हठी स्वभाव को जानते थे। इसलिए सभी राजा भयभीत हो गए होंगे। उन्हें पहले अपनी सुरक्षा ने सताया होगा। कुछ कुटिल राजा, जो धनुष नहीं तोड़ सके, इसलिए लज्जित थे, वे बहुत खुश हुए होंगे। वे मन-ही-मन कह रहे होंगे कि बच्चू! अब करलो सीता से शादी! अब यह परशुराम तुम्हें मजा चखाएगा।
3

तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का 'विनय' का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के 'तर्क' का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर:
किसी भी परिस्थिति से निपटने के दो मार्ग हैं- चुनौती या विनम्रता। पहला मार्ग है- विनम्रता। यदि नरमी से बात करके काम चल जाए और घमंडी व्यक्ति लज्जित हो जाए तो सर्वोत्तम। यदि वह फिर भी नहीं मानता, तो लक्ष्मण जैसा तेवर दिखाना उचित है, परंतु घमंडी आदमी को घमंड भरा उत्तर देने से बेकार की लड़ाई-झगड़ा बढ़ता है। उससे यथासंभव बचना चाहिए।
4

'हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।' श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?

उत्तर:
प्रायः लोग शुभ समाचार पर खुश होते हैं और अशुभ होने पर रोते हैं। वे भावनाओं में जीते हैं। वे भावनाओं से प्रभावित हुए बिना शांत होकर नहीं जी सकते। श्रीराम सुख-दुख से ऊपर हैं। वे परिस्थिति से प्रभावित हुए बिना शांत होकर रास्ता निकालते हैं। यह रास्ता सबसे कठिन है। इसके लिए संतुलन चाहिए। यह संतुलन श्रीराम को अन्य पात्रों से अलग तथा विशेष बनाता है।

मेरी कल्पना मेरे अनुमान(2 questions)

1

कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर:
मैं एक राजा हूँ। मैं भी सीता की चाह में आया था, परंतु सफल नहीं हो सका। राम वास्तव में सीता के योग्य थे। उन्होंने जिस तरह धनुष को तोड़ डाला, वह मेरे लिए अनुकरणीय था।तभी अचानक महाक्रोधी परशुराम जी जनक के दरबार में पधारे। आते ही 'अंगारे' उगलने लगे। उनके कंधों पर भयानक फरसा था। वे क्रोध में काँप रहे थे। उन्हें आता देखकर सभी राजा भयभीत हो उठे। सभी राजा ने अपने पिता का तथा अपना नाम बताया और परशुराम के चरणों में प्रणाम किया।राजा जनक ने भी उनके सामने शीश झुकाया। उन्होंने अपनी बेटी सीता को बुलाकर उससे भी प्रणाम करवाया। परशुराम ने सीता को आशीर्वाद दिया, जिससे वे और उनकी सखियाँ प्रसन्न हो गईं। इसके बाद विश्वामित्र उनसे मिले। उन्होंने राम और लक्ष्मण को भी परशुराम को प्रणाम करने के लिए कहा। परशुराम ने जाना कि ये दोनों सुंदर युवक राजा दशरथ की संतानें हैं। वे राम की सुंदरता को देखते ही रह गए।उसके बाद परशुराम ने राजा जनक से ललकार भरी वाणी में पूछा- ये सब राजा यहाँ क्यों एकत्र हैं? फिर धरती पर पड़े खंडित शिव धनुष को देखा तो क्रोध से काँपने लगे। राजा जनक ने शांत स्वर में उन्हें सीता स्वयंवर की बात बताई। वे क्रोध में बोले- जिस भी राजा ने शिव का धनुष तोड़ा है, वह इस राजसभा से उठकर अलग हो जाए। वरना हे राजा जनक! जहाँ तक तेरा राज है, उस सारी पृथ्वी को उलट-पलट डालूँगा। यह सुनकर सारे राजा काँपने लगे। कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन खुश हुए। सीता की माता के मुँह से निकला- हे भगवान! यह आफत बैठे-बिठाए कहाँ से आ गई? सीता परशुराम के क्रोध को देखकर बेचैन हो उठी।तब श्रीराम ने सब राजाओं के भय और अपनी प्रिया की बेचैनी को देखकर शांत स्वर में परशुराम से कहा- हे ब्राह्मणदेव! शिवधनुष तोड़ने वाला आपका ही एक सेवक है। क्रोध से काँपते हुए परशुराम ने कहा- सेवक वह होता है, जो सेवा करता है। जो शत्रुओं जैसा काम करता है, वह लड़ाई चाहता है। जिसने भी शिव-धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। उसे इस सभा में से अलग कर दो, वरना यहाँ बैठे सभी राजाओं को मार डालूँगा।मुनि परशुराम के बड़बोले वचन सुनकर लक्ष्मण मुस्कराने लगे। वे बोले- हे मुनिवर! ऐसे-ऐसे धनुष तो हमने बचपन में कई तोड़ डाले। कभी किसी ने उस पर क्रोध नहीं किया। परशुराम! इस धनुष पर अपनी इतनी ममता किसलिए है?यह सुनकर परशुराम क्रोधित हो उठे। बोले- ओ राजकुमार लक्ष्मण! लगता है तू काल के वश में आ गया है। तभी तुझसे सँभलकर बोला नहीं जा रहा। जो शिव धनुष सारे संसार में प्रसिद्ध है, उसे तुम तुच्छ-सा धनुष बता रहे हो!
2

"अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।" जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?(संकेत – सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)

उत्तर:
मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपनी उन्नति पर और अन्य लोगों की दुर्गति पर बहुत खुश होता है। परशुराम के क्रोध को देखकर जब राजा जनक डर से कुछ भी नहीं बोले तो कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन खुश हुए। उन्हें लगा कि अब राजा जनक, उनकी बेटी सीता और राम का अपमान होगा। हमारा क्या! हमें मजा आएगा। हम मजे से उनकी दुर्गति देखेंगे।

विधा से संवाद — कविता का सौंदर्य(1 questions)

1

यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के 'बालकांड' का एक अंश है जहाँ शिव धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। संवादों के माध्यम से ही पूरी कविता का कथात्मक विकास होता है। नीचे कविता के संवादों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। उन विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।विशेषताएँ – राम की विनम्रता, परशुराम का रौद्र रूप, लक्ष्मण का प्रत्युत्तर, पौराणिक संदर्भ, नाटकीयता

उत्तर:
राम की विनम्रता – "नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही।"परशुराम का रौद्र रूप – "अति रिस बोले बचन कठोरा। बहु जड़ जनक धनुष के तोरा।। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तब राजू।।"लक्ष्मण का प्रत्युत्तर – "बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहु न असि रिस कीन्हि गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू।"पौराणिक संदर्भ – "सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा। नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।"नाटकीयता – "आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करै लराई।"

विधा से संवाद — भाव-पहचान एवं विश्लेषण(2 questions)

1

आपने पढ़ा कि राजा जनक की सभा में उपस्थित विभिन्न पात्रों की मनःस्थिति अलग-अलग है। नीचे दिए गए भावों/मनःस्थिति को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिह्नित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है?भाव/मनःस्थिति – चिंता, क्रोध, व्यग्रता, भय, संयम/विनम्रता, ईर्ष्या/कुटिलता

उत्तर:
चिंता – पंक्ति: "बिधि अब सँवरी बात बिगारी" – पात्र: सीता की माता सुनयना – कारण: पुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित।क्रोध – पंक्ति: "बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।।" – पात्र: परशुराम – कारण: अपने गुरु शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर क्रुद्ध।व्यग्रता – पंक्ति: "अरध निमेष कलप सम बीता।।" – पात्र: सीता – कारण: परशुराम के क्रोध से व्यग्र हुईं।भय – पंक्ति: "पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड-प्रनामा।।" – पात्र: सभी भयभीत राजा – कारण: परशुराम की लाल-लाल आँखें और भयानक वेषभूषा तथा उनका भयंकर इतिहास।संयम/विनम्रता – पंक्ति: "नाथु संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।" – पात्र: राम – कारण: क्रुद्ध परशुराम के क्रोध को शांत करने का प्रयास।ईर्ष्या/कुटिलता – पंक्ति: "कुटिल भूप हरषे मन माहीं।" – पात्र: कुटिल पराजित राजा – कारण: परशुराम द्वारा धनुष-भंग करने वाले को दंड देने की घोषणा।
2

"अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।" परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।

उत्तर:
संदर्भ – परशुराम अपने गुरु शिव के धनुष को टूटा हुआ देखकर क्रोध में आ गए। राजा जनक ने जब सीता स्वयंवर की कहानी बताई तो उन्होंने प्रचंड क्रोध में कहा- जिसने भी यह धनुष तोड़ा है, उसे मेरे हवाले करो। वरना मैं तुम्हारे पूरे राज्य को उलट-पलट दूँगा।राजा जनक ने तो स्वयं यह कार्य करवाया था। इसीलिए वे कोई उत्तर न दे सके। वे मुनि के क्रोध से डर भी गए।राजा जनक के पास तीन रास्ते थे- चुप रहें, विनयपूर्वक क्षमा माँगें या अपनी सफाई में कुछ कहें। तीसरा रास्ता खतरनाक था। क्रोधी परशुराम कुछ सुनने को तैयार नहीं थे। विनयपूर्वक क्षमा माँगना कमज़ोरी का सूचक माना जाता। इससे राम और सीता के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता। अतः समझदारी दिखाते हुए वे चुप रहे।निष्कर्ष – मेरे विचार से राजा जनक का ऐसे समय में मौन रहना ही सबसे उपयुक्त था।

काव्य पंक्ति और भाव(2 questions)

(क)

"रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।" — यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?

उत्तर:
(क) प्रचंड क्रोध का भाव होता। चेहरा तमतमाया हुआ होता।
(ख)

आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे- परशुराम, राजा जनक, लक्ष्मण, राम, सभा में उपस्थित अन्य राजा

उत्तर:
परशुराम – प्रचंड क्रोध द्वारा। राजा जनक – समझदारी और शांति द्वारा। लक्ष्मण – उग्र चुनौती और ललकार द्वारा। राम – बहुत विवेक और शांति द्वारा। सभा में उपस्थित अन्य राजा – उपहास और परिहास (हँसी-ठिठोली) द्वारा।

विषयों से संवाद(2 questions)

1

सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदार चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।

उत्तर:
जब मैं किसी संस्था, संगठन या समूह का मुखिया होता हूँ तो मुझे सबको सँभालना होता है। तब मैं धैर्य, संयम, शांति, समझदारी और उदारता, विनम्रता से काम लेता हूँ। भूलकर भी क्रोध में नहीं आता। क्रोध से तू-तू, मैं-मैं और नोचानोची बढ़ती है।
2

कविता में वर्णित प्रसंग सीता स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक/ऐतिहासिक आदि घटना/प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।

उत्तर:
रामायण-महाभारत के काल में भी राजसी घरानों में स्वयंवर-प्रथा प्रचलित थी। द्रौपदी और अर्जुन का विवाह इसी प्रथा के चलते हुआ था। संसार के सभी क्षत्रिय योद्धा द्रुपद के राज्य में एकत्र हुए थे। शर्त थी कि जो भी धनुर्धर जल में परछाई देखकर ऊपर घूमती मछली को भेदेगा, वही द्रौपदी का वर होगा।पांडुपुत्र धनुर्धर अर्जुन ने नीचे जल में परछाई देखकर ऊपर घूमती मछली का बेधन किया था। इसी विजय से द्रौपदी और अर्जुन का विवाह हुआ था।

सृजन(3 questions)

1

परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।

उत्तर:
सीता – हाय! यह क्या हो गया? माँ – इस ब्राह्मण देवता ने भी अभी आना था? सीता – न जाने, अब क्या होगा? माँ – सब विधि का खेल है। जाने भगवान ने यह बना-बनाया खेल क्यों बिगाड़ दिया! मुझे तो ऐसे सुंदर सजीले दामाद मिले हैं। सीता – हाय! अब क्या होगा? मेरे राम मुझसे छिन तो नहीं जाएँगे। माँ – बेटी सीते! तू धीरज रख! तेरे पिता बहुत सयाने हैं। सीता – माँ! मुझे तो अपने राम पर भरोसा है। जब भगवान ने उन्हें मेरे लिए बनाया है तो रास्ता भी वही निकालेंगे।
2

सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए।(संकेत – लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)

उत्तर:
सीता – हे भगवान! हे मेरे राम! पहले ही दिन आप मेरी कैसी परीक्षा ले रहे हैं। मैं खुश हूँ कि आप जैसा पति मिला, परंतु विवाह होते ही संकट! न जाने मेरे भाग्य में क्या लिखा है! क्या मैं कभी चैन से नहीं जी पाऊँगी।ये परशुराम जी! फरसा उठाए न जाने कहाँ से टपक पड़े। न तो उन्हें ठीक से बात का पता है, न कुछ। बस यूँ ही आग हो रहे हैं। अरे, उनका स्वभाव ही महाक्रोधी है।और मेरे देवर! ये दिखने में तो बहुत कोमल, सुंदर और मनभावन हैं। पर हैं आग के गोले। उन्होंने परशुराम जी को ठीक जवाब दिया, पर कैसे बात बनेगी? न देवर जी चुप होंगे, न परशुराम जी!हाय मेरी माँ! उनकी तो जान निकल गई होगी। और पिता जनक! उनके दिल पर क्या बीत रही होगी। क्या बताऊँ! लगता है, मैं उनके संकट का कारण हूँ।हे राम! अब तो आप पर ही भरोसा है। कुछ कीजिए। मैं आपके ही भरोसे हूँ।
3

कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्त्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।

उत्तर:
मैं सोमेश, भारत की राजधानी दिल्ली का रहने वाला हूँ। अभी कक्षा नवीं का छात्र हूँ। मैंने कक्षा आठ में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। गणित ओलंपियाड में प्रथम चुना गया था। मैं बैडमिंटन का पूरी दिल्ली का चैंपियन हूँ। मैं गा भी सकता हूँ और नाच भी सकता हूँ।

भाषा से संवाद — व्याकरण की बात(1 questions)

1

नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए-• "देखत भृगुपति बेषु कराला।" • "बोले परसुधरहि अपमाने।।" • "सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू"यहाँ परशुराम को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है; जैसे- भृगुपति, परसुधर और भृगुकुलकेतू। इस कविता में दोहा-चौपाई का क्रम से होना, बिना वक्ता का नाम बताए उसका कथन कह देना, मुहावरों का उपयोग करना आदि विशेषताएँ हैं। नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए।विशेषता: अनुप्रास अलंकार, अतिशयोक्ति अलंकार, रूपक अलंकार

उत्तर:
अनुप्रास अलंकार (एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति) – "अपार मार मद मोचन", "बहुरि बिलोकि बिदेह", "नाग नगर नर नारी", "आयसु काह कहिअ किन", "सहसबाहु सम सो, सकल संसार।"अतिशयोक्ति अलंकार (बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना) – "उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।"रूपक अलंकार (रूप का आरोपण) – पाठ्य काव्यांश में रूपक अलंकार का अन्य कोई उदाहरण नहीं है। जो लोग 'भृगुकुलकेतू' को रूपक अलंकार का उदाहरण मानते हैं, वे जान लें कि इसमें उपमेय पर उपमान का आरोप नहीं है। यह केवल बहुव्रीहि समास का उदाहरण है।

भाषा से संवाद — बहुभाषिकता(1 questions)

1

यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है जो कि हिंदी भाषा का ही एक स्वरूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है। कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचानकर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए।(उदाहरण – कोही → क्रोधी → गुस्सैल)

उत्तर:
कोही – क्रोधी – गुस्सैल वेषु – वेष – भेस अरध – आधा निमेष – पल/क्षण बहोरि – फिर नृपु – राजा बिधि – विधाता तुरत – तुरंत परसुधर – परशुराम (फरसा धारण करने वाला) सुर – देवता त्रास – भय/भयानक सँवारना – सँवारना/सजाना चितवन – देखना भूप – राजा कराला – भयानक

भाषा से संवाद — लोक में भाषा(1 questions)

1

नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उसका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए।शब्द – मन, राम, राजा, बात, सिरु (सिर)

उत्तर:
मन – "मन चंगा तो कटौती में गंगा" – अर्थ: यदि मन पवित्र हो तो गंगा स्नान का सुख उसी से मिल जाता है।राम – "मुँह में राम बगल में छुरी" – अर्थ: दिखावे की सज्जनता, अंदर से पापी। वाक्य – उसकी मीठी-मीठी बातों में न आना। उसका तो वही हाल है- मुँह में राम बगल में छुरी।राजा – "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली" – अर्थ: दो असमान व्यक्तियों की तुलना। वाक्य – प्रधानमंत्री और पकौड़े वाले दोनों की तुलना कहाँ कर रहे हो? कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली।बात – "लातों के भूत बातों से नहीं मानते" – अर्थ: दुष्ट लोग पिटकर ही मानते हैं। वाक्य – यह दुष्ट समझाने से नहीं समझेगा। समझ लो, लातों के भूत बातों से नहीं मानते।सिरु (सिर) – "छछूंदर के सिर में चमेली का तेल" – अर्थ: अयोग्य व्यक्ति को मूल्यवान वस्तु मिल जाना। वाक्य – उस अँगूठा छाप को सुशिक्षित कन्या मिल गई। वाह! छछूंदर के सिर में चमेली का तेल।

भाषा से संवाद — गद्य-रूप(1 questions)

1

नीचे लिखी चौपाई को पढ़िए-"नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।"इस चौपाई को हम गद्य-रूप में भी लिख सकते हैं। इसमें राम परशुराम से विनम्रतापूर्वक कहते हैं- हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए-"अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।। सुर मुनि नाग नगर नर नारी सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।"

उत्तर:
बहुत भय के कारण राजा जनक उत्तर नहीं दे पा रहे थे। यह देखकर कुटिल राजा मन-ही-मन खुश होने लगे। वहाँ उपस्थित देवता, मुनि, नागवंश के लोग, नगर के नर-नारी- सब के दिलों पर भयानक भय छा गया। वे सोच में पड़ गए।

गतिविधियाँ(3 questions)

1

यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही (✓) का चिह्न लगाइए-

उत्तर:
क. राम ख. सीता की माता ग. परशुराम घ. जनक ङ. लक्ष्मण च. राम छ. परशुराम ज. लक्ष्मण
2

रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर:
अपने अध्यापक के मार्गदर्शन में नाटक खेलें। पात्रों की भूमिकाएँ बाँटें, संवादों का अभ्यास करें, ध्वनि-प्रभाव और वेशभूषा का ध्यान रखते हुए कविता को दृश्य नाटक के रूप में कक्षा में प्रस्तुत करें।
3

'कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।' इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।

उत्तर:
अध्यापक – क्यों नीलिमा! तुम बताओ, भय की स्थिति में सत्य कहना जरूरी है क्या? नीलिमा – जी श्रीमान जी! भय को जीतना बहुत जरूरी होता है। सुदेश – श्रीमन! ये कह तो रही हैं, पर परशुराम के क्रोध के सामने बोल सकेंगी क्या? नीलिमा – मैं मानती हूँ श्रीमान जी! यह बहुत कठिन होगा। सुदेश – कठिन ही नहीं, असंभव! जब देश गुलाम था, सारे लोग जैसे-तैसे जी ही रहे थे। नीलिमा – परंतु भूलो मत! भगतसिंह, सुभाष, सावरकर और गाँधी जैसे कुछ लोगों ने हिम्मत की। वे अंग्रेज़ों के सामने बोलने का साहस कर सके, तभी देश आज़ाद हुआ। सुदेश – हाँ, यह बात ठीक है। कोई इन जैसा हो तो वह कहने से नहीं चूकता। नीलिमा – श्रीमन! कोई कैसा है, इसका आकलन परिस्थिति पड़ने पर होता है। कक्षा में बातें करने से नहीं। मैं इतना जानती हूँ कि कठिन समय आने पर भी कुछ लोग हिम्मत रखते हैं, परंतु कुछ लोग कहने की सोच भी नहीं पाते हैं। सुदेश – श्रीमन! नीलिमा ठीक कह रही हैं। हिम्मती लोग कम होते हैं, परंतु होते जरूर हैं। हमें अपनी-अपनी हिम्मत टटोलनी चाहिए।

मेरी पहेली(1 questions)

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पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अब अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों- समाचार, धनुष, मन, नाग, नगर

उत्तर:
समाचार – नई-नई नित बात बताता, कहाँ क्या हुआ सब बतलाता। रहता नया सदा हर बार। क्यों सखि साजन? न! समाचार।धनुष – मूँछों जैसी दो छोरों पर बँधी हुई है डोर। तीर खींचकर छोड़ा, ऐसे घायल है चितचोर।मन – उसके होने से जय होती, न होने से हार। तेरे भीतर छिपा है हरदम, नहीं देता दीदार।नाग – लंबी मोटी पूँछ-सा हूँ मैं, किसी से भी भयभीत नहीं। लोग मुझे जहरीला कहते, किसी का भी मनमीत नहीं।नगर – पक्की सड़कें, पक्के घर हैं, कच्ची कोई नहीं डगर है। हर सुविधा से युक्त है रहता, बूझो मेरा वास किधर है?

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